Monday, November 30, 2015

समाज सुधार के लिए एक पैगाम

एक पैगाम समाज के नाम:-
                                     आदरणीय सभी पञ्च पटेल एवम् समस्त बुद्दिजीवी गण एवम् मेरे युवा साथियो
सभी पञ्च पटेलों और बुद्दीजीवीओ से विनम्र निवेदन है की आप DJ बन्द करने के तुगलकी फरमान जारी किये उन्हें वापस लेने का कष्ट करे  क्योकि युवाओ के साथ उनकी इच्छाओ को मारना या उन पर अपना नियम थोपना है आपको यदि ऐसा लगता है की dj बन्द होने से शराब बन्द हो जायेगी तो ये आपकी गलत सोच  या फिर यह कह सकते है की आपने शराब बन्द करने का गलत तरीका अपनाया है!
फिर भी यदि आपको लगता है की DJ बन्द होने से शराब बन्द हो जायेगी तो आप कृपया करके लिखित में अपने हस्ताक्षरित सहित दे साथ में अनुबन्ध होना चाहिए की यदि DJ बन्द होने के बाद भी शराब प्रचलन पाया जाता है अथवा देखा जाता है तो DJ की जुर्माना राशी एवम् शराब पर जो जुर्माना राशी समाज के सहायता कोष में जमा करेंगे!
यदि आप ऐसा करेंगे तो शायद शराब जरूर बन्द हो जायेगी अन्यथा कोई रास्ता नही है!
समाज प्रमुख समस्याए:-
                                  पञ्च पटेल और बुद्दिजीवी साथी इन विषयो पर भी अवश्य विचार-विमर्श करने का कष्ट करे
(1)दहेज़
(2)शराब
(3)ब्रामण को बुलाना बन्द करे
(4)अन्धविश्वास और पाखंडवाद
(5)छुआछुत

ये ऐसी समस्याए जो समाज को खोखला कर रही है!
(1)दहेज़:-
               समाज की मूल समस्या की जड़ है और इस समस्या ने गहरा रूप ले लिया है!
अपने बेटे को ऐसे बेचते है जैसे कोई भैंस का पाडा(बछड़ा) की बेच रहे हो
इतने से कम तो होगा ही नही अब बेचारा गरीब कहा से लाये इतना धन अरे भाई आपका पुत्र जी तो सर्विस में लग गया अब तो वही काफी कम लेगा पर नही लोगो को तो फ्री का खाने की आदत पड़ी हुई है जो अपने बेटे का मोल भाव करते है अतः आपसे निवेदन है इस समस्या पर अम्ल करे
(2)शराब:-
               शराब के बारे में ऊपर लिखा जा चूका है
(3)ब्राह्मण को बुलाना बन्द करे:-
                                            आज कल छोटे से छोटे काम में पंडित को बुलाना आम बात हो गयी है जो हमे अंदर ही अंदर मार रहा है!
ये लोग हमारे पैसे को हमसे ही लेकर हमारे ही विरोध में लगे रहते है ये ही लोग हमारे आरक्षण के विरोधी है! ये ही लोग हमे आगे नही बढ़ना देना चाहते और इन्हें पाल पोस कर बड़ा हम ही कर रहे है!

Note:-मीणा समाज में बहुत छात्रो ने संस्कृत में पीएचडी कर रखी है वे इन अनपढ़ बामणो से बेहतर है
इसी बहाने उन्हें रोजगार भी मिल जायेगा और आपके रूपये समाज के ही व्यक्ति के काम आएंगे!
(4)अंधविश्वास और पाखंडवाद:-
                                             धर्म के नाम अपने आप को लूटा रहा है! हमारा समाज आज कोई लड़का या लड़की अपनी मेहनत से नोकरी लगता ह फिर रामायण,भागवत और हवन पता नही क्या क्या
इन सब को बन्द करे इन में अपना पैसा बर्वाद करने से ज्यादा कुछ नही है! यदि आपको पढ़वाने ज्यादा ही शोक है तुलसीकृत रामचरित मानस को बन्द करे और वाल्मीकी रामायण पढ़वाये वो भी मीणा से ही
(5)छुआछुत:-
                    यह समस्या अभी तक पूरी तरह खत्म नही हुई है इस भी अपने विचार अवश्य रखे

आप से आशा करता हु की समाज में बदलाव होगा
यदि लेख कोई त्रुटि रह गयी हो तो क्षमा करे

Note:-शेयर करने वाले और आगे भेजने वाले भाइयो से निवेदन है लेख को तोड़-मोड़ कर इसकी ऐसी तैसी ना करे लेखक सन्दर्भ सहित भेजे,गुड़ गोबर कर देते हो
पोस्ट के लेखक के नाम को हटाकर या अपने हिसाब से तोड़ मरोड़कर अतः ऐसे ही रहने दे
®लेखक
जयसिंह नारेड़ा

Tuesday, September 29, 2015

माटी के लाल-आदिवासी कविता:-जयसिंह नारेड़ा

माटी के लाल-आदिवासी कविता:-जयसिंह नारेड़ा
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वो जो सभ्यताओं के जनक है, होमोफम्बर आदिवासी, संथाल-मुंडा-बोडो-भील, या फिर सहरिया-बिरहोर-मीण-उराव नामकृत , पड़े हैं निर्जन में, माटी के लाल ! जैसे कोई लावारिश लाश , मनुष्यत्व के झुरमुट से अलग-थलग,
बदनीयत सभ्यता ने काट फेंक दी हो !
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उन वन कबीलों में जँहा पाला था उन्होंने, सभ्यता का शैशव अपनी गोदी में , और चकमक के पत्थरों पर नचाई थी आग, वँही पसरा है तेजाबी अंधियाला , और कर रही लकड़बग्घे से आधुनिकता, बनवासियों का देहदहन ! जंगल अब मौकतल है , और दांडू मानो मॉडर्नटी पर मुर्दा इल्जाम !
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वो जिन्होंने दौड़ाई थी पृथ्वी, अपने उँगलियों के पहियों पर , और ढान्पी थी लाज अपने हुनर के पैबन्दो से, वही दौड़ रहे हैं भयभीत सहमे हुए नंगे बदन , अपने अस्तित्व के संघर्ष को , नंगे पाँव !
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लार टपका रहें उनकी बस्तियों पर , संविधान में बैठे कुछ अबूझे भूत, और लोकतन्त्रिया तांत्रिक कर रहे है , मुर्दहिया हैवानी अनुष्ठान ! आदि सभ्यता के अंतिम अवशेष , लुप्त हो रहे अत्विका , प्रगतिशील पैशाचिक भक्षण में , कर दिए गए है जंगल से ही तड़ीपार !
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वंहा सड़ चुका है कानून जाने कब से मरा पड़ा, सडांध मार रहा है चमगादड़ों सा लटका हुआ उलटा चिल्ला रहा है मै ज़िंदा हूँ ! एक मरहुआ ढोंगी तीमारदार ड्रगसिया हवस में, जंगल का जिस्म भोग रहा है !
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खिलते थे कभी वंहा सहजन की कली में पचपरगनिया-खड़िया-संताली- असुरिया जीवन के अनगिनत मधुर गीत बजते थे ढक-धमसा-दमना पर पर आदिवासियत के छऊ-सरहुल-बहा नृत्य राग और साथ आकर नाचता था सूरज चंद्रमा गीत गाता था वँही अब फैला है विलुप्तता का संत्रास !
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तुम भी कह दोगे ऐंठते हुए अरे वो दर्ज तो है तुम्हारा आदिवासी सविधान में मगर किस तरह महज एक ठूंठ सा शब्द अनुसूचित जाति किसी डरावनी खंडरिया धारा के अनुच्छेद में कैद एक गुनाह भर !
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पर मै कहूंगा , सावधान दांडू ! फिर ना कोई मांग बैठे एकलव्य का अंगूठा , सचेत रहो सहयोग से भी , जब तलक कोई भीलनी , कंही भी घुमाई जायेगी निर्वस्त्र , कोई केवट नहीं कराएगा , किसी राम को गंगा नदी पार !
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एक पहाड़िया विद्रोह का भस्म उठा लाओ बिरसा मुंडा-टन्टया की धधकती अस्थियों से तान लो जरा प्रत्यंचा पर विद्रोह करो महाजुटान महाक्रान्ति का अपनी कमान पर जरा देह-हड्डियों की सुप्त दहकन को सीधा करो साधो हुलगुलानो के ब्रह्म तीर और गिद्धई आँखे फोड़ दो ! के सुरहुलत्सव में ना चढाने पड़े टेशु के खून सने फूल !
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नदियों का हत्याकांड , शाल के कटे हुए जिस्म , सींच दो अपने बलिदानों से सारडा-कारो-खरकई सबको पुनर्जीवित करो है जंगल के पुजारी लोहे के प्रगालनी जरा जंगल की रंगोली को प्रतिरक्षित करो न रह जाए कंही पहाड़ भी महज शमशान का एक पत्थर !
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क्योंकि सजाए रखेंगे सरकारी दस्तावेज बड़ी संजीदगी- साफगोई से आदिवासियत के मुर्दा पथरीले माडल किसी ट्रेड फेयर में सजा देंगे शौकैस की तरह निर्जीव दांडू बिकने को खड़ा छोड़ दिया जाएगा और फिर दे दी जायेगी कंही दो मिनट की फरेब मौन श्रद्धांजली और भुला दिए जाओगे किसी किस्से की तरह !
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याद आयेंगे आप को भी बस , आप जो पढ़ रहे , किसी ऐसी ही कविता में आंसुओं से टपक जायेंगे , और फिर आप भी इस सदमे से बाहर !
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और फिर आयेगा कोई पुरातत्वेत्ता खोदेगा पांच-छह फूट जमीन और कहेगा आदिवासी ! हुलजोहर ! बस तभी आयेंगे दो पल को आदिवासी साइडलाइन के श्राप से मुक्त हमारी मेनस्ट्रीम में !
लेखक:-
©जयसिंह नारेड़ा

Monday, September 21, 2015

आदिवासी तेरा शोषण:-जयसिंह नारेड़ा

~~~~~~~आदिवासी तेरा शोषण~~~~~~

जिस आरक्षण के वृक्ष तले तुमने छाया और फल खाया है
उसकी जड़ो मे दुश्मन ने तेजाब आज गिरवाया है!
जिसके पैरो को तुम पुजो वह सिर पर अब चढ आया है
वह स्वयं सामने नही आता,भीलो पे रंग चढाया है!
आदिवासी तेरा शोषण सदियो से होता आया है!!
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आदिवासी तुम राजा थे,अब रंको जैसा हाल किया
संस्कृति तुम्हारी नष्ट करी,इतिहास तुम्हारा जला दिया!
जौंक की तरह आदिवासी सदियो से तेरा खुन पिया
संभूक ऋषि को मरवाया,एकलव्य का अगुंठा काट दिया!
अब नया षणयन्त्र रचा मीना-मीणा मे भेद किया
फिर भी तुम इनको आदर दो,यह समझ नही आया है!
आदिवासी तेरा शोषण सदियो से होता आया है!!
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अब तो जागो सोने वालो नही काम चलेगा सोने से!
हल्दी क्या अपना रंग छोड़े क्या? लाख बार धोने से!!
समय चूक पछताओगे ,क्या होगा फिर रोने से!
आगे कैसे बढ पाओगे,यो दब-दब-दबके रहने से!!
मत दुध पिलाओ सर्पो को,इसलिये तुम्हे चेताया है!
आदिवासी तेरा शोषण सदियो से होता आया है!!
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तुम प्रकृति पुजक रहे सदा,अब दिशाहीन क्यो होते हो!
सदियो से गुलामी का बोझा क्यो अपने सिर पर ढोते हो!!
तुम मूलनिवासी भारत के,क्यो भुला दिया अपने बल को!
तुम नही अभी तक समझ सके,दुश्मन के कपट भरे छल को!!
अपने बल को तुम याद करे,दुश्मन को खुब छकाया है!
आदिवासी तेरा शोषण सदियो से होता आया है!!
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सिन्धु घाटा का इतिहास गवाह,तुम प्रेम सहित सब रहते थे!
था नही कही पर भेदभाव,ना जाति-पाति करते थे!!
प्रकृति उन्नत यहॉ रही सदा धन धान्य युक्त यह देश था!
पावन जल सिन्धु नदी का था,सौन्दर्य प्रकृति परिवेश था!!
वह क्षेत्र तुम्हारा अनुपम था,वहॉ झरने अविरल झरते थे!
तब नर तो क्या हिंसक पशु भी आदिवासी से डरते थे!!
कर स्वर्ग नरक का भेद देख,तुमको कमजोर बनाया है!
आदिवासी तेरा शोषण सदियो से होता आया है!!
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युरोप एशिया से आकर आर्यो ने पॉव जमाया है!
धन धान्य युक्त भारत देखा,फिर इनका जी ललचाया है!!
यहॉ जातिवाद को फैलाकर ऊच नीच का भेद किया!
मुखिया बन बैठे भारत के,मनुस्मृति का निर्माण किया!!
जिसने देखा नही वेदो को,वह चतुर्वेदी कहलाया है!
आदिवासी तेरा शोषण सदियो से होता आया है!!
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यहॉ वर्ण व्यवस्था लागू कर,हमको शुद्रो का नाम दिया!
खुद सबसे ऊचे बन बैठे,हमको नीचो का काम दिया!!
हमको ही दानव असुर कहा,हम सुरापान नही करते थे!
हम आन बान की रक्षा के हित,जीते थे और मरते थे!!
हमको शिक्षा से दुर रखा,नहू अक्षर का ज्ञान कराया है!
आदिवासी तेरा शोषण सदियो से होता आया है!!
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चाहे युवा मौत भी घर मे हो,तुम घर पर इन्हे बुलाते है!
नही शौक कभी ये करते,देशी घी को खा जाते है!!
है नमक मिर्च कम सब्जी मे,ये मिर्च नमक करवाते है!
खा पीकर माल हमारा ये,फिर दान दक्षिणा पाते है!
खुद तो जमकर खाते है,घर घंटी मे भरकर ले जाते है!!
कितना पूजो चाहे दान करो,फिर भी देखो घुर्राया है!
आदिवासी तेरा शोषण सदियो से होता आया है!!
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ये ही कोर्टो मे बैठे है,और समाचार पेपर इनके!
इलेक्ट्रिक,मिडिया,न्याय पालिका,टेलिविजन भी इनके!!
अारक्षण विरोधी स्वर्ण पार्टी,मिशन 72 भी इनके!
यहा सब मंदिर बने हमारे,लेकिन महंत बने इनके!!
अब योग्य हुए हम पढ लिखकर,इसलिये तो ये घबराया है!
आदिवासी तेरा शोषण सदियो से होता आया है!!
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जब जागेगा आदिवासी, नही कर्महीन टिक पायेगा!
हुंकार भरेगा भूमि पुत्र,तब कौन सामने आयेगा!!
मीणा-मीना मे भेद किया,सब मिनटे मे मिट जायेगा!
इसलिये एकजुट हो जाओ,संघर्ष करो,संगठित रहो!!
सदियो से किया तेरा शोषण,सब ब्याज सहित चुक जायेगा!
आदिवासी तेरा शोषण,तब नही कोई कर पायेगा!!
आदीवासी तेरा शोषण,तब नही कोई कर पायेगा

लेखक-गजराज भारती,राष्ट्रीय सचिव,समता सैनिक दल
एवम्
कैलाश चन्द मीणा(पत्रकार) नांगल शेरपुर

प्रेषक:-जयसिंह नारेड़ा